मुख पृष्ठ » कुछ खास » गुरुमंत्र » कब शुरू कर रहे हैं अपने लिए जीना?
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सवाल सोचने वाला है, अपने लिए ही तो जी रहे हैं सभी यही कहेंगे। लेकिन जरा ईमानदारी से खुद से पूछें कि क्या वाकई आप अपने लिए जी रहे हैं? असमंजस की स्थिति है। हां कहना बेईमानी होगी और ना कहना नाइंसाफी...! एक सच्ची घटना शायद आपकी कुछ मदद कर सकें।

एक व्यक्ति को दिल का हल्का दौरा पड़ा तो तुरंत डॉक्टर को दिखाया, डॉक्टर ने उसे तुरंत गहन चिकित्सा इकाई में भर्ती करने की सलाह दी तो उस व्यक्ति ने पूछा - साहब परसों भर्ती हो जाऊँ तो नहीं चलेगा! डॉक्टर ने पूछा- ऐसी क्या मजबूरी है?उस व्यक्ति ने कहा- सर मेरे घनिष्ठ मित्र के बेटे की शादी है, ऐसे में मैं नहीं गया तो उसे बुरा लगेगा।

डॉक्टर ने समझाया कि दिल का दौरा किसी भी वक्त जानलेवा हो सकता है। वह व्यक्ति नहीं माना और अपनी जान जोखिम में डालकर उस जश्न में शामिल हुआ, जिसमें उसके होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। तो क्या वो अपने लिए जी रहा है?

एक आम विचार जो अक्सर मरीजों से सुनने को मिलता है- साहब समय ही नहीं मिलता है। और ये तब सुनने को मिलता है, जब उनसे कहा जाता है कि आप नियम से आधा घंटा व्यायाम कीजिए। व्यायाम करने को इसलिए कहा जाता है कि या तो वे मोटे हैं या उच्च रक्तचाप, मधुमेह या हृदयाघात के मरीज हैं। जब उनसे पूछा जाए कि समय क्यों नहीं मिलता? तो जवाब मिलेगा- काम इतना होता है कि व्यायाम का समय नहीं मिल पाता है। जब पूछें कि आप काम क्यों कर रहे हैं? तो जवाब मिलेगा- पैसा कमाने के लिए।

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और पैसा क्यों कमा रहे हैं?

जवाब होगा- जिंदगी आराम से गुजारने के लिए।

और यदि किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए तो? तब कुछ लोग असमंजस में नजर आते हैं, लेकिन कुछ लोगों का जवाब बड़ा विचित्र होता है। वे कहते हैं- यदि किसी गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए तो इलाज के लिए पैसा लगेगा। इसीलिए तो गधे की तरह हम्माली करके पैसा कमा रहे हैं।

अब सोचिए कि यदि वे आधा घंटा व्यायाम कर लें तो बीमारी की चपेट में आने से बच सकते हैं। और जब स्वस्थ रहेंगे तभी तो आराम की जिंदगी जी पाएँगे। यदि बहुत पैसा है, लेकिन स्वस्थ नहीं है तो फिर आप बस अपना पैसा इलाज पर खर्च करते रहिए। यूँ ही नहीं कहा गया है- पहला सुख निरोगी काया...।

इस दौर में हर व्यक्ति किसी न किसी दबाव में जी रहा है। जिस काम को करके वह प्रसन्ना नहीं है, उसका मन, उसकी आत्मा जिस काम को करने के लिए इंकार कर रही है, वह फिर भी वही काम किए जा रहा है। क्यों? पैसे की वजह से, लोगों के कहने की वजह से, असुरक्षा की वजह से। हम वो करें जिसे करना हमें खुश करें तभी तो हम सही मायनों में खुद के लिए जिएँगे ना...!

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तेज बारिश हो रही है, मन हल्का है और बारिश में भीगने के लिए बेचैन हैं। लेकिन मन के किसी कोने में ये विचार जागता है कि ये बचपना है और यदि किसी ने देख लिया तो वो क्या कहेगा... बताइए, क्या आप अपने लिए जी रहे हैं? आप घर से निकलने को है, लेकिन रेडियो पर आपका मनपसंद गाना चल रहा है। आप पाँच मिनट मैनेज भी कर सकते हैं, लेकिन ये सोचकर आप घर से निकल जाएँगे कि ये भी क्या बात हुई? नहीं पाँच मिनट अपने मन के कहने पर रुक जाइए, देखिए मन कैसे ऊर्जा से भर जाएगा और दिनभर कैसा हल्का-फुल्का गुजरेगा।

सार तो सिर्फ इतना ही है कि जीवन की व्यस्तताओं, सामाजिक, पारिवारिक या व्यवसायगत समस्याओं के बीच आप अपने लिए, अपनी खुशी और जरूरत के लिए समय निकालें। बेवजह अपनी इच्छाओं को न मारें, तभी आप अपने लिए जी पाएँगे। जब आप चाहें खुशी तब आपको मिले ये जरूरी नहीं है, खुशी जब बिखरे तभी उसे समेट लें, यही समझदारी है, यही होशियारी भी। तो आप कब से जीना शुरू करेंगे खुद के लिए...?
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